Monday, 20 July 2015

 धंधा मंदा तो गुस्से में बंदा !

'हाँ भाई, जल्दी बोल के चाइए तन्ने! थैली लाया है ना, येल्ले आपणा दूध.…खुल्ले पैसे ना लाया तू आज भी, चल बाकी के पैसे पकड़!' चार सिक्के खन्न से काउंटर पे गिरे. 'भाया अब जरा साइड को होल्ले।'
'हाँ जी मैडम जी ये लो दही, छाछ और दूध. आपके बने 107 रुपये और ये लो बाकी 13 रुपये,' सिक्के दही-दूध से गमकते काउंटर पर लगभग फेंकते हुए दुकानदार बोला.
'क्यों भाई, आज बहुत गर्मी है क्या?' मैं ने हलकी मुस्कराहट के साथ उस से पूछा।
'ना मैडम, आज ते घणी बारिश हुई सै. क्यों पूछ रही हो आप?'
मैं ने पहले पीछे मुड़ के देखा, कोई लाइन में खड़ा ना देख मैं ने कहा, 'भाई, आप गुस्से में क्यों हो आज?'
'ना जी, गुस्से ना हूँ जी!' थोड़ा शर्मिंदा होते हुए वो साफ़ काउंटर को कपड़ा मारने लगा।
'वो लोग खुल्ले पैसे ना लाते फिर झिकझिक करते हैं, धंधा ख़राब होता है मैडम। जगह-जगह डेरी खुल गयी है तो धंधा वैसे ही मंदा चल रहा है.'
'अच्छा भाई, एक वैनिला आइसक्रीम की ब्रिक और एक बड़ा चॉकलेट कप दे दो.' मैं ने डेढ़ सौ रुपये उसे और पकड़ाए।
'चॉकलेट कप तो आज है ना मैडम, और कोई दे दूँ?' वैनिला ब्रिक को मेरे बैग में डालते हुए दुकानदार ने पूछा। ग्राहक को खाली हाथ लौटाना धंधे के उसूलों के खिलाफ है ये उसके अंदर का व्यापारी अच्छी तरह जानता था।
'तो जो आप को पसंद है वो ही दे दो आप.'
'तो मैडम, आप ये नया मैंगो संडे ले जाओ, बहुत टेस्टी है.'
'ये लो भाई, आज ये मैंगो संडे आप मेरी तरफ से खाओ, चिल करो और वादा करो कि अब गुस्सा नहीं करोगे, पैसे और सामान ग्राहक को फेंक के नहीं दोगे!'

No comments:

Post a Comment