Wednesday, 1 April 2015

लव ऐट लाल बत्ती
कल तू आ रही है ना?
कहाँ, वहीं मेट्रो स्टेशन पे?
नहीं रे, कल तो मंडे है, वहाँ बहुत भीड़ होगी। हुमांयू के मक़बरे पे चलते हैं.
नहीं नहीं, मक़बरे में नहीं!
क्यों? वहाँ तो इतनी हरियाली है और कोई भीड़ भी नहीं होगी।
इसीलिये तो!
क्या मतलब?
शहर की भीड़-भाड़ में धक्के खाते हुए, गाड़ियों का धुँआ फांकते हुए भी एक-दूसरे की धुंधलाई आँखों में खो जाने का सुख हरे-भरे बाग़ की ठंडी हवा में कहाँ!
सही कहा तूने. पेड़ों के चक्कर लगाते हुए गाना गाने की तो ना उम्र रही ना इच्छा। अब तो चाँद तारो की जगह ये ट्रैफिक लाइट की टिमटिमाहट ही ज्यादा मनभाती है.
याद है, यहीं इसी चौराहे पे बीस साल पहले तू मिला था और यहीं लाल बत्ती पे कभी खिलोने तो कभी दिल वाले गुब्बारे बेचते हुए कितनी गाड़ियों के चक्कर काटे हमने। होरन की पीं पीं के शोर में ही दिल की कितनी बातें बाँटी थी।
और इसी गोल चक्कर के चक्कर लगाते लगाते हम भले ही बूढ़े हो चले, पाँव भले ही डगमगाने लगे हैं पर हमारा प्यार आज भी ढला नहीं है.
हाँ रे, यहाँ थमने वाली गाड़ियाँ भले ही आठ फुट से सोलह फुट हो गयी पर गाडीवालों के दिल उतने ही छोटे हैं. बंद शीशों के अंदर से उन्हें हम गरीबों के रिश्ते भी बिन्नेस ही नजर आते हैं.
चल छोड़, अपने इसी प्यार के नाम पे अपनी डेट फिक्स, कल फिर से यहीं इसी लाल बत्ती पे, लिट्टी चोखा और छाछ के साथ! .
धीरे धीरे बोल कोई सुन ना ले..........सुन ना ले कोई सुन ना ले।





  

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