तुम कब लौटोगे?

जब से रुख़सत हुए तुम अमावस की उस काली रात
मुड़ कर एक बार भी ना देखा तुम ने,
एक आलिंगन के साथ वादा किया था कि
लौट आओगे पूनम के चाँद से पहले।
ना जाने कितने चाँद ढल चुके,
रोशन ना हुआ अब तक ईद का चाँद मेरा!
क्या दीदारे-यार ना होगा अब कभी?
रुख़ बदल चुका इस दास्ताने-मोहब्बत का,
तुम कब लौटोगे?

मैं कोशिश करुँ क्या, एक बार फिर
कि खोल सकूँ वो जंग लग चुके ताले,
मुद्दतों से जो कभी खुले नहीं,
वो चरमराते दरवाज़े
जर्जर हो चुके जो इतने सालों में,
मेरे मन की खिड़कियां
जिनमें किसी ने झाँका नहीं एक अरसे से,
ख़ुशनुमा यादों पे लगे जाले बुहारने की
कोशिश करे क्या ये दिल, तुम्हारे लिए फिर एक बार?

क्या याद है तुम्हें अब भी
वो छोटी-छोटी घंटियों वाली नेमप्लेट
इश्क़ के रंगों से उकेरे थे जिस पे
तुम ने एक दूल्हा दुल्हन
और मैं ने, नाम हम दोनों के?
वो अब भी वहीं लटकी है, अकेली,
बंद दरवाज़े के बाहर,
उन घंटियों की मौसिक़ी भी अब खामोश है,
इंतज़ार में तुम्हारे।

मुझे आज भी याद है वो पल
जब एहतराम किया था हरसिंगार के पेड़ ने
पहले दिन हमारा इस आँगन में
ख़ूबसूरत सफ़ेद-नारंगी फूलों की बारिश से,
मानो दुआएं दे रहा हो,
महकता रहे सदा गुलिस्तां तुम्हारा
इनकी मनभावनी खुशबू सा। पर अफ़सोस,
वो हरसिंगार अब नहीं रहा,
बिलकुल हमारे रिश्ते की तरह।

हाँ, उसका उजड़ा ठूँठ अब भी है,
सूखा, मुरझाया, ग़मज़दा,
गोया बसंत में भी पतझड़ का मारा,
बिलकुल मेरी तरह।
हाँ लेकिन, उम्मीद का एक पत्ता बाकी है,
मेरी साँसों की तरह अब भी,
पूरी ताक़त से लड़ते हुए तूफ़ानों से,
कि शायद वो बिछड़ा हमसफ़र मिल जाये
पीछे छूट गए तन्हा राही को।

पर कितनी देर और?
कितने मौसम बीत चले, बरसात के साथ
इन ग़मगीन आँखों का काजल भी धुल चुका,
मौसमे-बहार का इंतज़ार करूँ तो कब तक
जबकि पतझड़ मेरे जीवन का हिस्सा बन चुका है?
कड़वी ही सही, पर हक़ीक़त यही है
कि रुत बदल रही है और ना जाने कौन से पल,
उम्मीद का वो एक आख़िरी पत्ता भी ढह जाए, क्योंकि
एक कमज़ोर शाख़ से ज्यादा कमज़ोर होता है एक तन्हा दिल।

तो फैसला अब ये है कि, तुम हो ना हो,
कमज़ोर ना पड़ेंगे अब कभी ये दरो-दीवार,
ये खिड़कियाँ बंद ही रहेंगी अब, तुम्हारे लिए।
हरसिंगार फिर महकेगा, पर सिर्फ़ मेरे लिए।
कोई उम्मीद तुम ना रखना अब
कि राह तकती रहेगी दुल्हन आख़िरी दम तक
आँखें बिछाए तुम्हारे इंतज़ार में, क्योंकि
नेमप्लेट पे धुंधलाते तुम्हारे नाम की तरह
वजूद मिट चुका होगा तुम्हारा मेरे मन के कैनवास से,

तुम जब तक लौटोगे।

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