Monday, 12 September 2016


नया सियापा!

चलो आज फिर कुछ नया करते हैं, एक नया सियापा!

कुछ पुराना, पर फिर भी कुछ मासूम दिल के करीब सा,
कुछ नयी शरारतें, फिर भी हों वही बचपन की आहटें,
रात ढले की चुटर-पुटर चुगने वाली भूख से किचेन में धावा बोलना,
कुछ खट्टे-मीठे-तीखे की तलाश में सारे डब्बे उलट-पुलट कर देना,
माँ के 'मिर्च' लेबल वाले डब्बे से लड्डू का बचा-खुचा चूरा चुराना,
और कुछ नहीं तो नमकीन में हरी मिर्च-प्याज़ के स्पेशल तड़के पे चटखारे मारना,
दूर कहीँ चौकीदार के खौ-खौ वाले 'जागते रहो' की नक़ल लगाना,
और नरम ओस तले दूर नीले आसमान में 'मिल्की वे' और ध्रुव तारे को ताकना,
उनींदी आँखों को मलते-मलते भी अंत्याक्षरी वाले गाने का सुर पकड़े रहना,
''अरे सो जाओ, क्या खी खी लगा रखी है'' वाली डाँट का इंतज़ार करना,
आखिरकार सूरज के पहली किरण के साथ ही अलसाई आँखों में नींद समा जाना।
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अरे ये नया सियापा है क्या!

नया सियापा....

यानि कि परदेश में बैठे किसी विदेशी 'फ्रेंड' या पड़ोस वाले शर्मा अंकल की बेटी से 'चैटियाना',
माँ के सवालो की जगह Quora पे अजनबियों के प्रश्नों पे जवाब पोस्ट करना,
धुंधलाए नीले आसमान को छोड़ नीले स्क्रीन पे मिल्की वे तलाशना,
हर हफ़्ते एक नया-नवेला गेम डाउनलोड करना,
कभी फार्मविले में फसल उगाना तो कभी जीती जागती खूबसूरती की बजाय कैंडी पे क्रश होना,
कभी अपनी किताबो की जगह पोकेमॉन की तलाश में रात-बेरात मीलों दूर निकल जाना,
देर रात वाली छोटी भूख के लिए छोटी मैगी में हरी मिर्च-प्याज का तड़का लगाना,
नर्म ओस वाली चारपाई की बजाय नर्म गद्दे पे लोट कर एयरकंडीशंनर की हवा खाना,
उनींदी आँखों को मलते-मलते भी जैज़, रॉक, रैप के सुर पकडे रहना,
और ''अरे सो जाओ, क्या शोर मचा रखा है'' वाली डाँट का इंतज़ार करना,
आखिरकार सूरज के पहली किरण के साथ ही अलसाई आँखों में नींद समा जाना।

यही तो है आज का नया सियापा!








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