Wednesday, 9 March 2016

AAZADI

महिलाएं-पुरुष क्या चाहें?

महिलाएं क्या चाहें ?
आज़ादी!
'देवी माँ' बनने से आज़ादी,
'पैर की जूती' बनने से आज़ादी,
'खानदान की इज़्ज़त' का बोझ ढोने से आज़ादी,
सेल्फलेस, सेक्रिफिशिअल बनने की उम्मीदों से आज़ादी,
सिर्फ़ एक औरत, एक इंसान होने की आज़ादी,
'ना' कहने की मनाही से आज़ादी,
'दो टके की औरत' कहलाने से आज़ादी,
महिला दिवस के नाम पर डिस्काउंट ऑफर्स के आक्रमण से आज़ादी,
मेकअप की दो इंच मोटी परतों से आज़ादी,
फेयर एंड लवली होने से आज़ादी,
डार्क एंड अगली रहने की आज़ादी,
पतली होने के दबाव से आज़ादी,
ऑफिस में काम ना करने के आरोप से आज़ादी,
अपने आप को साबित करने के लिए घर-बाहर दुगना काम करने से आज़ादी,
फिर भी अच्छी माँ, बीवी, बहू, कर्मचारी ना बन पाने के गिल्ट से आज़ादी,

पुरुष क्या चाहें?
आज़ादी!
'बहादुर लड़के ' होने से आज़ादी,
'आदमी रोते नहीं' से आज़ादी,
'मर्द को दर्द नहीं होता' से आज़ादी,
रोज़ रोज़ शेव करने से आज़ादी, 
बर्थडे, एनिवर्सरी याद रखने की मजबूरी से आज़ादी,
बस, ट्रेन में महिलाओं के लिए सीट खाली करने से आज़ादी,
प्रोफ़ेशनल कॉलेजेस, नौकरियों में महिलाओं को प्राथमिकता से आज़ादी,
परिवार का मुख्य पोषक (ब्रेड विनर) होने से आज़ादी,
सिर्फ पैसा कमाने के बजाय अपना मनचाहा करने की आज़ादी,
गलती न होने पर भी महिला उत्पीड़क कहलाये जाने से आज़ादी,
मॉलेस्टेर, सेक्सिस्ट, मेल शॉवनिस्ट पिग कहलाये जाने के भय से आज़ादी,

महिलाएं पुरुष दोनों क्या चाहें?
धर्म-संस्कृति-सभ्यता के नाम पर सदियों पुराने नियमो-मान्यताओं को मानते रहने की मजबूरी से आज़ादी !
लैंगिक समानता के ज़माने में भी ज़बर्दस्ती थोपी जा रही बासी मानसिकता और सेल्फ-इम्पोज़्ड-इमेज से आज़ादी!





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