डिश के रंग निराले
शहर के अंदर कोई झोपड़पट्टी हो या शहर से दूर कहीं कोई गाँव, अधकच्चे अधपक्के दोमंजिले घर हो या टूटी फूटी खपरैल वाली झोपड़ियां, छतों के ऊपर कुकुरमुत्ते सी एक डंडे पे उगी केबल टी वी की डिश अनिवार्य हो चुकी है. और हो भी क्यों ना? गरीब की नीरस बेरंग ज़िंदगी में रस और रंग  भरने की ज़िम्मेदारी अब टी वी के हवाले हो चुकी है. क्या वो कजरी क्या वो आल्हा, क्या वो कुश्ती क्या वो कबड्डी, अब तो सारे तीज त्यौहार इस गोल तश्तरी के संग साथ के बिना अधूरे से लगते हैं. चुन्नू की अम्मा, रानी की दादी, गुल्लन का भाई, कबीर के अब्बा, शीला की बेटी और जुम्मन का लड़का........ सभी के सपने अब इस आकाश से उतरी उडनतश्तरी की मेहरबानी से ही अवतरित हो पाते हैं. कच्ची लकड़ी के फट्टे और प्लास्टिक की गेंद से खेलने की पीड़ा स्टेडियम में सफ़ेद चमचमाती ड्रेस में सचमुच के बैट बॉल से खेलते क्रिकेटरों को देख कर कुछ और टीसने लगती है पर एक बटन दाबते ही होटल में नाचते गाते हीरो हीरोइन को देखते ही हर जवान होते छोरा छोरी के मन में भी कुछ अनूठे अरमान फिर करवट लेने लगते हैं. गरीब की ज़िंदगी की सूनी थाली में कुछ नए स्वाद भर देने का ज़रिया है ये डिश!

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