Monday, 2 February 2015

Ek Aur Pariwar

एक और परिवार चला आया है.

अपने गाँव की देहरी को एक झटके में लांघ कर,
उथली हो गयी नदी के पाट बाँध कर,
मटियाले पेड़ों की छाया का आराम छोड़ कर,
अपनी कच्ची मड़ैया की टूटी खपरैल,
और गोबर से गंधाती दीवारें छोड़कर,
बच्चों की ताल के मटमैले पानी में छलांगे समेट कर,
उन्मुक्त किलकारियाँ, खिलखिलाते चेहरो की हँसी
एक फटी गठरी में मज़बूती से कैद कर,
क्योंकि सूखी बंजर ज़मीन पे सपने नहीं उगते,
खाली हवा से पेट नहीं भरा करते,
उपलों की आंच में उधार का दानव भस्म नहीं होता,
और गाँव के टीले की चढ़ाई से एवरेस्ट फतह नहीं होती.

तो आज फिर एक परिवार शहर चला आया है.

घरघराती हुई बस की छत पे सपने लादे,
पेट में आग और दिल में सिर्फ़ चंद अरमान छुपाये,
गाँव के पडोसी चाचा के दोस्त का नाम
चुन्नू की कॉपी के एक पर्चे में मजबूती से लपेटे,
और आखिरी कुछ सौ के नोट अंटी में समेटे,
बड़े से शॉपिंग मॉल की झिलमिलाती रंगीन बत्तियों से परे
है 7 ×8 फ़ीट की गुफाओं की लम्बी कतार ,
यही है इन पनियाई आँखों के सपनों की पनाह,
पास की सोसाइटी के चंद घर बने माँ की कर्मगाह,
लम्बी चमचमाती गाड़ियों में दिखती है बाप्पा की मेहनत की फसल,
बहन की धोती में सिमटी टांगो को ढक लिया है
शोरूम की नीली पैंट शर्ट वाली वर्दी ने
और पप्पू के स्कूल के बैग को साहब के ब्रीफकेस ने,
अटपटायी गंवई जुबां पे अब जगह  ले ली है वेलकम सॉरी और थैंक यू ने.

आज फ़िर एक शहरी चश्मे ने गाँव को रंगीन आँखे दे दी हैं.

गाँव का मछली वाला ताल, टीले वाली पहाड़ी, कच्ची पगडण्डी,
लहलहाती मटर की छीमी, अमरुद और आम का पेड़ नहीं तो न सही,
जंगली फूलों पे मंडराती तितलियाँ, सरपट भगाती मुर्गियाँ,
बारिश में भीगे मोर के नीले पंख और चहचहाती चिड़ियाँ नहीं तो न सही,
पेट की आग बुझाने को भरपूर खाना और तन ढकने को साबुत कपड़े तो है,
गाँव की चौपाल और बतियाने को टाइम नहीं तो क्या, हाथ में एक मोबाइल तो है,
कमरे में खिड़की नहीं तो क्या, साहूकार के तक़ाज़ों की लटकी तलवार तो नहीं,
ज़मीन अपनी नहीं तो क्या, सपनों की उड़ान के लिए मुक्त आकाश तो है!

बस गम है तो सिर्फ यही, गाँव में शहर और शहर में गाँव नहीं होता!

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