Tuesday, 22 December 2015

वो  सोनीपत की छोरी,  और वो इन्दिरापुरम का गोरा......दोनों की नज़रें मिली थी एक सर्द शाम के गहराते अंधियारे में पुरानी दिल्ली के एक पुराने बस स्टॉप पे. बस की इंतज़ार में छोरी थी कुछ घबराई सी, लड़का कुछ उकताया सा.
अचानक लड़की ने अपना उजियाला सा शॉल उतार कर दूर फेंका और चिल्लाई, 'उफ़ ये क्या है!बचाओ बचाओ!' पहले तो लड़का कुछ घबराया, 'मैं ने तो कुछ नहीं किया, लड़की और उसके अलावा और कोई वहाँ था नहीं, फिर ये क्यों चिल्लाई?' वो कुछ ठिठका, कुछ ठहरा, फिर हिम्मत जुटा कर दौड़ा लड़की की मदद करने। 
'एक नामाकूल कॉकरोच की ये मज़ाल की आप की शान में गुस्ताख़ी करे'.....लड़के ने माहौल को थोड़ा हल्का करने के लिए एक हल्का वाला जोक मारा। 
अगले आठ-दस महीनों में कुछ हलके कुछ भारी, कुछ मीठे कुछ खट्टे हंसी-मज़ाक, रूठना मनाना चलता रहा. मेट्रो स्टेशन, शॉपिंग मॉल, स्टेडियम की अधखुली-अनजानी सीढ़ियाँ बहुत जल्द उनकी मुलाकातों की गवाह बन गयी. मूलचंद के परांठे, सरोजिनी नगर की शॉपिंग, के-नैग्स के तंदूरी मोमोज़, आई टी ओ वाले अंकल की चाय और उनकी लिखी किताबें, लाजपतनगर का बंटे वाला लेमन-सोडा और चाइनीज़ चाट (!), यूपीएससी की भारी भरकम बेस्वाद भल्ला पापड़ी.........उनकी गप्पों में अनूठे स्वाद यहीं से मिलते रहे. हुमायूँ का मक़बरा, निजामुद्दीन के पार्क, सुन्दर नगर की नर्सरी, तुगलकाबाद फोर्ट, संजय लेक.........कोई ऐसी जगह ना बची थी जिसकी मिट्टी पे उनके क़दमों के निशाँ ना छूटे हों, कोई ऐसा फ़िज़ा ना थी जहाँ उनकी मीठी मुस्कुराहटों की खुशबू ना फैली हो, कोई ऐसा कोना ना था जहाँ उनकी हंसी ना गूंजती हो. 
फिर एक दिन........ वो आ गया!
वो! 
जिसके आने पे पार्क, शॉपिंग मॉल, सिनेमा, रेस्तरॉं, पब सुनसान पड़ जाते हैं, वो जिसके आने पे होठों की मुस्कुराहटें गायब हो जाती हैं, वो जिसके नाम से ही बच्चे, माँ-बाप सब खौफ में आ जाते हैं!

वो यानि कॉलेज के एनुअल एक्साम्स!

और फिर?....... फिर क्या!
फिर बस फ़ोन का बिल आसमान पे!!






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